मूल नक्षत्र
27 में से #19 · 240°00′–253°20′ निरयण · धनु में
विशेषताएँ
| स्वामी ग्रह (विंशोत्तरी स्वामी) | केतु |
|---|---|
| देवता | निर्ऋति |
| प्रतीक | बँधी हुई जड़ें |
| गण (स्वभाव) | राक्षस (उग्र) गण का स्वभाव — तीव्र, स्वेच्छाचारी और अपरंपरागत |
| नाड़ी (प्रकृति) | वात (वायव्य) प्रकृति — तीव्र, गतिशील और सृजनशील |
| योनि (सहज-प्रवृत्ति) | श्वान — निष्ठावान और रक्षक |
| स्वभाव (मुहूर्त) | तीक्ष्ण — तीक्ष्ण कार्यों (अनुशासन, एकाग्रता, विच्छेद) के लिए उपयुक्त |
चार पद
| पद | विस्तार (निरयण) | राशि |
|---|---|---|
| 1 | 240°00′ – 243°20′ | धनु (Dhanu) |
| 2 | 243°20′ – 246°40′ | धनु (Dhanu) |
| 3 | 246°40′ – 250°00′ | धनु (Dhanu) |
| 4 | 250°00′ – 253°20′ | धनु (Dhanu) |
प्रत्येक पद 3°20′ का है — 13°20′ चाप का नवांश-तुल्य चौथाई भाग।
मूल का विवेचन
मूल — अधिष्ठाता देव निर्ऋति, प्रतीक "बँधी हुई जड़ें", स्वामी केतु। इसमें राक्षस (उग्र) गण का स्वभाव — तीव्र, स्वेच्छाचारी और अपरंपरागत है, साथ ही वात (वायव्य) प्रकृति — तीव्र, गतिशील और सृजनशील; निष्ठावान और रक्षक सहज-प्रवृत्ति (श्वान योनि)। केतु का स्वामित्व वैराग्य, अध्यात्म, पूर्वजन्म के कौशल, मुक्ति और अंतर्ज्ञान प्रदान करता है। यहाँ की ऊर्जाएँ तीक्ष्ण कार्यों (अनुशासन, एकाग्रता, विच्छेद) के अनुकूल हैं।
तथ्य-विशेषताओं (देवता / प्रतीक / स्वामी / गण / नाड़ी / योनि / स्वभाव) से रचित — वही उद्धृत विवेचना जो कुंडली डैशबोर्ड दिखाता है; केवल सामान्य प्रवृत्तियाँ, कभी घटनाएँ या परिणाम नहीं।
आपके प्रश्नों के उत्तर
मूल नक्षत्र का स्वामी कौन सा ग्रह है?
केतु — मूल का विंशोत्तरी दशा स्वामी।
मूल के देवता कौन हैं?
निर्ऋति; इसका प्रतीक बँधी हुई जड़ें है।
मूल किन अंशों में फैला है?
240°00′–253°20′ निरयण — अर्थात् 0°00′ धनु से 13°20′ धनु तक, धनु में।
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